ISRO

इसरो एक नजर में

इसरो

 

एक ऐसा संगठन जिसमे स्पेस रिसर्च और एक्सप्लोरेशन के क्षेत्र में एक नया मुकाम हासिल करते हुए पूरी दुनिया में अपनी एक अलग और विश्वसनीय पहचान बना ली है वह कोई और नहीं हमारा स्वदेशी संगठन इसरो है। इसका पूरा नाम इंडियन स्पेस रिसर्च आर्गेनाईजेशन है। भारत में आज प्रतिष्ठित संगठनो की बात की जाये तो इसरो का नाम ही शायद सबसे पहले लिया जाता है। इसका कारण इस संगठन का बीते कुछ वर्षो का रिजल्ट है। इसरो ने अपने कदम कुछ इस रफ़्तार से बढ़ाये है कि लोगो ने तो इसकी तुलना अब नासा से की जाने लगी है और इसके कारनामें न्यूज़ पेपर एवं टीवी चैनल्स की हेडलाइंस में पूरी तरह से छाये हुए है।

 

इतिहास एक नजर में

1969: इसरो की नींव

हमारा भारत 1947 में स्वतंत्र हुआ। तब जहा दूसरे देश स्पेस में जाने की तैयारी में लगे थे वही भारत गरीबी और भूखमरी जैसी समस्याओ से जूझ रहा था। ऐसे में हमारे लिए स्पेस रिसर्च और एक्सप्लोरेशन जैसी बातें किसी सपने से कम नहीं थी लेकिन विक्रम सारा भाई उन लोगो में से थे जिनका यह मानना था कि दुनिया भर के देशो में भारत एक महत्त्वपूर्ण देश बनना चाहता है तो उन्हें आधुनिक तकनीकी को अपनाना ही होगा और उसका उपयोग समाज की समस्याओ के हल निकलने में करना होगा। इन्ही मजबूत इरादों के साथ सारा भाई ने इसरो की स्थापना साल 1969 में भारत के स्वतंत्रता दिवस पर की थी। इसीलिए उन्हें भारत के स्पेस प्रोग्राम का जनक भी कहा जाता है।

हाला की स्थापना 1969 में हुई थी लेकिन इसरो के वैज्ञानिको ने स्पेस सम्बन्धी विषयों पर विकास और खोज 1960 से शुरू कर दी थी। उनदिनों ये संगठन अपने शुरुवाती चरण में होने के कारण उनके पास अपना खुद का वर्कशॉप नहीं था। अंतरिक्ष से सम्बन्धी विषयों पर काम करने के लिए उन्हें एक वर्कशॉप की तलाश थी जो कि केरल में एक कैथलिक चर्च सेण्ट मैरी मैकडेलन के मिलने पर पूरी हुयी। उसके बाद काम आसान हो गया फिर चर्च के मॉडिफिकेशन का काम शुरू हुआ और एक कामचलाऊ वर्कशॉप और लेबोरेटरी में बदल डाला। इसी तरह एक चर्च में इंडियन स्पेस प्रोग्राम की बुनियाद रखी गयी।

 

1963: इंडियाज फर्स्ट साउंडिंग रॉकेट

उसके बाद 1963 में भारत का पहला राकेट लांच किया गया जिसे हम इंडियाज फर्स्ट साउंडिंग रॉकेट के नाम से भी जाना जाता है। हाला की यह रॉकेट भारत का अपना बनाया हुआ नहीं था अपितु इसके लिए भारत को रूस और फ्रांस से मदद लेनी पड़ीं। इस तरह से हमारे पहले रॉकेट लांच को सफलता मिली। इसमें एक दिलचस्प बात भी रही क्योंकि जब राकेट लॉन्च के लिए ले जाने वाला साधन साइकिल था और इसी तरह 1981 में एक एप्पल उपग्रह के प्रक्षेपण के लिए बैल-गाड़ी का भी प्रयोग किया गया था। यही सब बाते सिद्ध करती है कि हमारे इसरो ने कभी भी अपनी आर्थिक समस्याओ को अपने तकनीकी के विकास पर हावी नहीं होने दिया।

1975: आर्यभट्ट का प्रक्षेपण

19 अप्रैल 1975 में जब भारत का पहला उपग्रह प्रक्षेपित हुआ किया गया तब उसका नाम आर्यभट्ट दिया गया। यह उपग्रह भारत का पहला उपग्रह था और इसका नाम हमारे महान गणितज्ञ-खगोलविद आर्यभट्ट के नाम पर रखा गया था। आर्यभट्ट पूर्णरूप से भारत में बनाया गया था लेकिन इसके प्रक्षेपण के लिए भारत को रूस से मदद लेनी पड़ी।

साल 1979 तक इसरो खुद के उपग्रह बनाने में तो कामयाब हो चूका था पर लेकिन उन्हें अंतरिक्ष में प्रक्षेपित करने के लिए उसे दूसरे देशो के स्पेस आर्गेनाईजेशन से मदद लेनी पड़ती थी। फिर इसरो ने 1980 में भारत ने न ही भारत ने केवल खुद का उपग्रह बनाया बल्कि उसे बड़ी सफलता के साथ अंतरिक्ष में प्रक्षेपित भी कर दिया। ये था रोहिणी जो की भारत का पहला स्वदेशी प्रक्षेपण मिशन था अर्थात उपगृह निर्माण और प्रक्षेपण के लिए पूरी तरह भारतीय तकनीकी और साधनो का इस्तेमाल किया गया था। अंततः इसी मिशन के साथ भारत उन गिनती के देशो में सुमार हो गया जो अपने तकनीकी के बल पर अंतरिक्ष में जाने में सफल हो गए.

2008: चंद्रयान प्रथम

भारत का पहला अन्वेषण मिशन चंद्रयान प्रथम था जो की साल 2008 की एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धियों में गिनी जाती है। इस मिशन का उद्देश्य चन्द्रमा की सतह की छानबीन और नए धातुओं की खोज करना था जिसके लिए MIP (moon impact probe) नामक इंट्रूमेंट का प्रयोग किया जाना था। 18 नवंबर 2018 को MIP ने सतह पर उतरा तो उसने कुछ ऐसी चीज खोज निकली जिसने भारत को दुनिया का पहला ऐसा देश बन गया जिसने चाँद के ऊपर पानी होने का सबूत पेश किया। ये मिशन भारतीय अंतरिक्ष मिशन के लिए बहुत कारीगर साबित हुआ क्योंकि MIP के उतरने के साथ ही भारत विश्व का चौथा ऐसा देश बन गया जिसने अबतक चाँद पर अपना धव्ज फहराया था।

चंद्रयान प्रथम के सफल परिक्षण के बाद इसरो ने एक कदम आगे बढ़ाते हुए मंगल मिशन की ओर कदम बढ़ाया। इस मिशन को मार्स ऑर्बिटर मिशन के नाम से भी जानते है और ये मिशन सफल रहा। इसके साथ ही भारत मंगल पर पहुंचने वाले देशो की श्रेणी में चौथा देश बन गया। इस मिशन में एक खास बात यह भी रही की यह पहली ही बार में सफल रहा। इस मिशन का पूरा बजट 450 करोड़ था अर्थात अगर प्रति किलोमीटर का खर्च देखा जाये तो लगभग 6 रूपये होते है। 2013 में बनी हॉलीवुड फ़िल्म ग्रेविटी का खर्च भी इस बजट से ज़्यादा था और अगर पिछले 40 सालो में इसरो का खर्च देखा जाये तो नासा के एक साल के खर्च के आधे से भी कम है।इससे एक सीख तो ज़रूर मिलती है कि बड़ी सफलता केवल ज़्यादा पैसे के साथ ही नहीं आती है।

क्रायोजनिक इंजन

कुछ सालो पहले इसरो अपने स्पेस प्रोग्राम के लिए 1986 में क्रायोजनिक इंजन बनाना चाहता था। यह एक ऐसा इंजन था जो की काम ईंधन की खपत में ज़्यादा से ज़्यादा वजन उठाने की काबिलियत रखता था। इस तकनीकी से अनजान होने के वजह से इसरो ने अमेरिका से मदद मांगनी चाही। अमेरिका ने ये मदद ये कह कर ठुकरा दी की भारत इस तकनीकी का प्रयोग नुक्लेअर हथियारों में कर सकता है। दूसरी तरफ रूस ने अमेरिका के दबाव में आकर तकनीकी देने से तो मना कर दिया लेकिन क्रायोजनिक इंजन देने में भारत की मदद की। बिना तकनीकी मदद के इन इंजन को समझना ऐसे था जैसे किसी छोटे बच्चे को हवाई जहाज चलने को देना। इन सभी परिस्थितियों के बाद 14 सालो के अथक परिश्रम के बाद साल 2014 में भारत ने न सिर्फ़ अपना क्रायोजनिक इंजन बनाया बल्कि उससे बड़ी सफलतापूर्वक स्पेस में भी लांच कर दिया।

NAVIC

दुनिया में ऐसे बहुत काम देश होंगे जिनके पास अपने खुद के नेविगेशन सिस्टम है और भारत उन देशो में से एक है। भारत ने खुद का रीजनल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम बना लिया है। इससे भारत का जीपीएस सिस्टम भी कह सकते है। जिसके चलते भारत को अन्य देशो के जीपीएस पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। बहुत कम लोग ही जानते है कि 1999 के कारगिल में भारत को घुसपैठ की जानकारी के लिए अमेरिकी जीपीएस की ज़रूरत थी। भारत ने अमेरिका से मदद भी मांगी परन्तु कोई मदद न मिली। इस वजह से भारत को काफी नुक्सान उठाना पड़ा, जिससे सिख लेकर ही भारत ने खुद का जीपीएस बनाने की ठानी। 28 जुलाई 2016 को भारत का नेविगेशन सिस्टम नाविक शुरू हो गया।

2017: 104 उपग्रहों का एक साथ प्रक्षेपण

15 फ़रवरी 2017 को भारत के श्रीहरिकोटा, आंध्र प्रदेश से एक ऐतिहासिक प्रक्षेपण हुआ। जिसने इसने भारत की भूमिका को विश्व पटल पर पूरी तरह से महत्त्वपूर्ण साबित की। इस दिन भारत ने एक साथ 104 उपग्रह को अंतरिक्ष में प्रक्षेपित करके विश्व का पहला सबसे ज़्यादा उपग्रह लांच करने वाला देश बन गया। इन 104 उपग्रहों में 3 भारत, 96 अमेरिका, बाकि बचे एक-एक इजराइल, कजाकिस्तान, नीदरलैंड, स्विट्ज़रलैंड और UAE के थे।

 

 

दोस्तों हमे इसरो पर गर्व होना चाहिए जिसने भारत को विज्ञान के क्षेत्र में एक नए स्तर पर पंहुचा दिया और तो और इसरो की कहानी ऐसी है जिसने हमे ये भी सिखाया की बड़े मुकाम को हासिल करने के लिए बड़े हौसले और लगन की ज़रूरत होती है ना कि बड़े आर्थिक मदद की।

। । जय हिन्द, जय भारत। ।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *